मंगलवार, 25 जुलाई 2017

"1966 में बनी मीणा मेव महापंचायत का पतन कट्टरपंथी और राजनेतिक लोगो की बजह से "

भारत की मीणा जनजाति अति प्राचीन आदिवासी जनजाति है जो मत्स्य,मीन,मैंणा,मारण, ने,नेवर के नाम से भी प्रसिद्ध रही है ।

अति प्राचीन जनजाति होने के कारण यह जनजाति बहुत सी जातियों और संस्कृति के सम्पर्क में भी आयी जिस के कारण इस जनजाति से कई उपजाति के जन्म और सांस्कृतिक परिवर्तन से इनकार नहीं किया जा सकता ।

भारत पर मध्यकाल तक अधिकाँश विदेशी आक्रमण पश्चिम से हुए और उन्हें रोकने का काम मीणा जनजाति ने प्राचीन समय से निरन्तर किया जिसके कारण विदेशी आक्रमणकारियों और भारत (सिद्ध देश) के मूलनिवासियों के मध्य मीणा जनजाति एक सुरक्षा दीवार की तरह उपस्थिति रही ।

प्रारम्भिक आर्य आक्रमण के समय भी इस जनजाति ने प्रतिरोध किया जिसका प्रमाण ऋग्वेदिककालीन दस राजा युद्ध में इस जनजाति द्वारा  आर्य राजा सुदास के विरुद्ध युद्ध में भाग लेने का वर्णन मिलता है  तो विदेशी आर्य ब्राह्मण परसुराम से मत्स्यराज के युद्ध का वर्णन भी गर्न्थो में मिल जाता है ।##( परसुराम जब युद्ध में मत्स्यराज को जीत नहीं सका तो धोखे से मत्स्यराज की हत्या कर देता है जिस पर मेरी अगली पोस्ट में जानकारी दी जायेगी । देवराज । )##

मीना जनजाति ने विदेशी आर्यों से ही नहीं बल्कि मुस्लिम आक्रमणकारियों से भी मुकाबला किया । कुछ क्षेत्रों में परास्त होने पर मीणा जनजाति से एक नई जाति मुस्लिम मेव का जन्म होता है । मेव वो मीणा थे जो मुस्लिम आक्रमणकारियों से परास्त हो कर इस्लाम धर्म को ग्रहण कर लेते है लेकिन अपनी मूल संस्कृति को नहीं छोड़ते । दरिया खान और शशिवदनी का विवाह सम्बन्ध इस बात का प्रमाण था की मेव जाति मीनाओ से ही निकली थी और उनमें विवाह सम्बन्ध आम बात थी । ( मीना इतिहास शोधकों को इस बात पर भी शोध करने की आवश्यकता है की पिछले 5000 से 8000 साल के मध्य और कोनसी उपजातियां है जिनकी उत्पति मीना जनजाति से हुयी है ? )

## ( दरिया खान और शशिवदनी की प्रेमकहानी ढोला मारू की कहानी की तरह लोकजीवन में प्रसिद्ध रही है लेकिन निरन्तर आक्रमण और नई नई संस्कृतियों के सम्पर्क में आने से मीना जनजाति की संस्कृति बहुरंगी बनी । एक तरफ मीना लोगो द्वारा प्राचीन जनजाति की परम्पराओं का पालन किया जाता है तो दूसरी तरफ निरन्तर युद्ध के कारण हुए सम्पर्क के कारण दूसरी संस्कृति की परम्पराओं का प्रभाव भी मीना जनजाति पर देखने को मिलता है लेकिन इस में कोई शक नहीं की इस जनजाति ने आदिकाल से निरन्तर विदेशियों से प्रतिरोध के साथ आजादी के लिए संघर्ष किया । ये संघर्ष मध्यकाल जो राजपूत मुगल गठबन्धन के कारण इस जाति के लिए राजनेतिक, सामजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पतन का काल रहा, में भी जारी रहा तो अंग्रेजो के आक्रमण के समय भी आजादी के लिए निरन्तर संघर्ष जारी रहा जिसके कारण इस जनजाति के आजादी और अधिकार प्राप्ति के लिए किये गए संघर्ष को अपराध माना गया और जरायम पेशा कानून द्वारा इस जनजाति के स्वाभिमान को ध्वस्त करने का षड्यंत्र राजपूत शासक और अंग्रेजों ने मिल कर किया और मीना जनजाति को अपराधिक जनजाति घोषित कर दिया गया । ये ठीक उसी तरह की घटना थी जिस तरह भारत के आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन से बेदखल करने पर किये गए हथियारबन्ध संघर्ष को नक्शली और नक्शलवाद की संज्ञा दी गयी । )##

विदेशी आक्रमणकारियों से सीधे प्रतिरोध का नुक्सान इस जनजाति को उठाना पड़ा और राजपूत मुगल गठबंधन के कारण पतन का शिकार होना पड़ा । मुस्लिम आक्रमणकारियों के प्रभाव के कारण इस जनजाति में बड़े स्तर पर धर्म परिवर्तन हुआ और इस्लाम धर्म परिवर्तित मीणा मेव कहलाये जाने लगे। कालांतर में मेवो के घर बापसी के भी प्रयास किये गए जिनमे 1966 का मीणा मेव सम्मेलन मुख्य था ।

सन् 1966 में मेव मीणा एकता को लेकर मेव मीणा सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसके आयोजक मेव मीना कार्यकर्ताओ के साथ मुख्य रूप से हरियाणा के रामसिंह सेवरा व् मास्टर रहमत खां के एडवोकेट पुत्र मोहम्मद इस्माइल खां थे ।

सम्मेलन के पूर्व श्री रामसिंह सेवरा ने कप्तान छुट्टन लाल जी,  हरिकिशन जी तहसीलदार (विधायक राजगढ़), कुम्हेर प्रधान और स्वतन्त्रता सैनानी भीमसिंह जी एडवोकेट, समाजसेवी श्री भैरवलाल "काला बादल" से पुर्वानुमति ले कर मोहम्मद इस्माइल खान के साथ दो महीने तक मेवात क्षेत्र का दौरा किया लेकिन मेव मीणा सम्मेलन के दिन ही सम्भवत सम्पर्क अभाव के कारण श्री  झूतालाल जी ने बस्सी क्षेत्र के स्थानीय सामजिक कार्यकर्ताओ की मीटिंग आयोजित करवा कर कप्तान छुट्टन लाल के आने की घोषणा करवा दी । कप्तान साहब ने मेव मीणा सम्मेलन में न जा कर बस्सी जाने का निर्णय किया  ( कप्तान साहब का ये भी मानना था की इस सम्मेलन से हिन्दू मुस्लिम दंगे भड़क सकते है जो भड़के भी थे जिसके पीछे निसन्देह साम्प्रदायिक और राजनेतिक ताकतों का हाथ रहा ) जबकि मीणा समाज के श्री भीमसिंह जी एडवोकेट, श्री भैरवलाल "काला बादल", श्री बद्री प्रसाद दुखिया, श्री गोविन्द राम आयकर अधिकारी सहित मुख्य वरिष्ठ सामजिक कार्यकर्त्ता मीना मेव एकता के लिए इस सम्मेलन में उपस्थिति हुए तथा बडोद मेव के लार्ड सन्नू खां मेवाती, मेवात के प्रमुख मेव चौधरी भी सम्मेलन में पधारे । सम्मेलन में "मीणा मेव महापंचायत" का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष श्री हरिकिशन जी मीना को तथा उपाध्यक्ष मास्टर रहमत खां के पुत्र एडवोकेट इस्माइल खां को बनाया गया ।

अलवर के प्रभावशाली कोंग्रेसी राजनेता शोभाराम,  डीग के एक जाट के साथ बिना आमन्त्रण सम्मेलन में उपस्थित हुए । शोभाराम राजनेतिक व्यक्ति थे जिन्होंने इस बात को महशुश कर लिया की मेव मीणा एकता से मेवाती क्षेत्र में मेव और मीणा एक राजनेतिक ताकत के रूप में उभर सकते है जो स्थापित राजनेताओ के लिए एक चुनोती भी बन सकती है ।

ज्ञात जानकारी के अनुसार सम्मेलन के बाद राजनेता शोभाराम ने इस सम्मेलन के प्रभाव को इस रूप में प्रसारित किया की मेव इस्लाम धर्म छोड़ कर हिन्दू बनने जा रहे है । इस तरह का सन्देश का प्रसार मोलवियों को भड़काने बाला और मीणा मेव एकता के लिए नकारात्मक था । मोलवियों ने ये सुचना जामा मस्जिद तक भी पहुंचा दी ।

साम्प्रदायिक ताकतों और साम्प्रदायिक लोगों ने धार्मिक सद्भावना के प्रतीक मास्टर रहमत खां की हत्या मेरठ क्षेत्र में  कर दी तथा अलवर कोर्ट परिसर में मास्टर रहमत खान के पुत्र इस्माइल खान पर जानलेवा हमला किया गया । इन हिंसक घटनाओ से श्री हरिकिशन जी ने विचलित हो अध्यक्ष पद पर कार्य करने में असमर्थता जाहिर की जिसके पीछे सम्भवत दबाव एवं भय रहा हो फलत कुछ ही दिनों में  "मीना मेव महापंचायत" जो मेव मीणा एकता के लिए एक मील का पत्थर साबित होती राजनेतिक और कट्टरपंथी लोगो के प्रभाव के कारण निष्क्रिय हो कर लुप्त हो गयी ।  
अगर उस समय के मेव मीणा राजनेताओ ने इस मुद्दे पर गम्भीरता और साहसिकता दिखायी होती तो मेव मीना समाज के समाजिक कार्यकर्ताओं के प्रयास निसंदेह सफल होते और मेव मीणा एकता की शक्ति एक निर्णायक ताकत बन चुकी होती साथ ही मेवों की घर बापसी के साथ राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी एकता को मजबूती मिलती ।

मेव मीणा एकता के कुछ गम्भीर प्रयास इसके बाद डॉ किरोड़ी लाल मीणा एवं रमेश मीणा (भूतपूर्व विधायक )  द्वारा किये गए लेकिन एक राजनेतिक व्यक्ति होने के कारण उनके प्रयासों को भी पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं हो सकी । इस दिशा में मेव मीना सामाजिक संघटनो को गम्भीरता से एक बार पुनः गैरराजनीतिक रूप से प्रयास करने की आवश्यकता जिससे मेव मीणा सामाजिक सद्भावना के साथ आदिवासी जगत को एक ताकत प्राप्त हो ।

साहित्यिक एवम् इतिहास लेखकों की तरफ से इस दिशा में सत्यान्वेषण के लिए प्रयास किये गए है जिसका प्रमाण मुंशी खां बालोत एवं डॉ पी. एस. सहारिया द्वारा लिखित पुस्तक " मेवात का इतिहास और संस्कृति " है जिसमें डॉ ब्रजकिशोर शर्मा, डॉ प्रह्लाद सिंह मीना, डॉ मुंशी खां बालोत, सिद्धिकी अहमद मेव, डॉ फूल सिंह सहारिया, डॉ जीवन सिंह मानवी, भगवान दास मोरवाल, डॉ महावीर प्रसाद शर्मा, प्रो वी के वशिष्ठ, डॉ के सी यादव, डॉ एस सी मिश्रा, डॉ अनुराधा माथुर, डॉ छंगाराम मीना, चौधरी रहीम खान, डॉ देशराज वर्मा, सीमा गौतम, डॉ शीतल मीना, सूर्यदेव सिंह बारहट, डॉ अशोक कुमार मीना, मुबीना, डॉ यशोदा मीना, डॉ अंजना वर्मा, राजाराम भादू, डॉ आँचल मीना, डॉ अविनाश चन्द्र नागपाल, राजदुलारी मखेचा, बनवारी लाल यादव, उस्मानी फौजी जैसे विद्वान लेखकों के लेखों का मेव और मीना की साझा संस्कृति पर संकलन किया गया है ।
नोट:- इस लेख का उद्देश्य अतीत को जानने के साथ मेव  मीणा समाज के वास्तविक सामजिक कार्यकर्ताओ के कार्यों को समाज के सामने लाना तथा भविष्य के लिए जागरूकता पैदा करना है । 
लेखक:- डॉ प्रह्लाद सिंह मीना ( मीणा इतिहास शोधक एवं लेखक ) 
एवं डी एस "देवराज" ( एसोसिएट फाउंडर हक रक्षक दल )

अतीत का जरायम पेशा कानून से शाषित मीना और आज के नक्सली ?

अंग्रेजों द्वारा गुलामी का विरोध करने बाले और हजारों साल से अपनी जल, जंगल जमीन को पाने के लिए गोरिल्ला पध्दति से हमले, लूट मार करने और अमीरों के धन गरीबो में बांटने बाले लोगो को किसी समय डकैत, चोर, अपराधी कहा गया और आजादी का संघर्ष करने बाले लोगो और समुदायों पर जरायम पेशा कानून लाद कर दमन करने का प्रयास किया गया । जिसमे जरायम पेशा कानून से शासित जातियां राजाओं और अंग्रेजो की पुलिस के रहमोकरम पर जिंदा थी । आज जिन अत्याचारों की बात नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों के आदिवासियोँ पर होने की जानकारी मिल रही है उसी तरह के अत्याचार जरायम पेशा कानून से शासित जातियों और भी होते थे।  उन की कहीं सुनवाई नहीं थी , बेगुनाहों को जेल में डाल दिया जाता था, छोटे छोटे बच्चो को अपराधी घोसित कर के थानों में हाजरी लगाई जाती ।  जन्म से ही बच्चे को अपराधी माना जाता । एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने के लिए थानेदार के पैरों पर गिड़गिड़ाना पड़ता और लिखित में इजाजत ले कर जाना पड़ता । इस इजाजत के लिए क्या समझौते किये जाते उसका अनुमान ही लगाया जा सकता है । किसी की मजबूरी का फायदा किस रूप में उठाया जाए ये थानाधिकारी की इच्छा पर निर्भर था।  जरायम पेशा कानून जो अत्याचार और अमानवीयता का दूसरा नाम था वो राजस्थान की मीना जनजाति पर भी लागू होताथा ।  Ravindra पड़ेवा जी के शोध के मुताविक इस कानून को मीना जनजाति को कुचलने के लिए लाया गया था क्योकि इस कानून को लागू करने से पूर्व हुई चर्चा में इस जनजाति का विशेष जिक्र किया गया था ।  मीना जनजाति जिसने हमेशा विदेशी आक्रमणकारियों से टक्कर ले कर अंदरूनी भारत की रक्षा करी उसने बलबन के समय एक लाख मीनाओ के सर की कुर्वानी दी थी तो राजपूत काल में इन्ही मीनाओ को जिंदा जला कर राज सत्ता और भूमि से बेदखल किया गया लेकिन इस जनजाति ने अपने जल जंगल जमीन को पाने के प्रयास नहीं छोड़े और जंगलों में मेवासे बना कर अपने अधिकार को पाने के लिए राजा महाराजा, बादशाह, अंग्रेजो को हमेशा चुनोती देते रहे । शोषण और प्रतिरोध का ये दौर काफी लंबा रहा लेकिन अंग्रेजो के जरायम पेशा एक्ट ने शोषण की सारी हद पार कर दी । मीना समाज के प्रथम पीढ़ी के समाज सुधारकों ने इस अमानवीय एक्ट के अहिंसात्मक विरोध प्रारम्भ किया और राजाओं के अत्याचार सहे और जेल भी काटी लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर जरायम पेशा कानून का विरोध शुरू हो चुका था जिसका समर्थन तत्कालीन कोंग्रेस और उसके लीडरों ने भी किया । अहिंसात्मक आंदोलनों के परिणाम सकारात्मक निकला और राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन भी मिला साथ ही भारत की आजादी के साथ ये एक्ट भी समाप्त कर दिया गया । नक्सलवादी राह पर चलने बाली मीना जनजाति के प्रथम पीढ़ी के समाज सुधारकों जिनमे गणपतराम बगरानिया जी, लक्ष्मीनारायण झरवाल जी, बद्री प्रसाद दुखिया जी, गोविन्दराम जी, भीम सिंह जी, काला बादल जी, अडिसाल जी, नोरावत जी, पंडित बंशीधर शर्मा जी, राजेन्द्र कुमार अज्ञेय जी और बहुत से प्रमुख नाम शामिल है ने एक तरफ अमानवीय कानून जरायम पेशा कानून, ददरासी कानून का विरोध किया तो दूसरी तरफ समाज के विकास का रोडमेप शिक्षा के रूप में चुनते हुए जातीय सुधार पर ध्यान केंद्रित किया जिसका सकारात्मक परिणाम भी मिला ।  नक्सलवादी क्षेत्र के आदिवासियो और कश्मीर के पत्थरवाजों  के लिए मीना समाज का ये इतिहास प्रेरक हो सकता है । अन्याय का विरोध होना आवश्यक है लेकिन तरीका लोकतांत्रिक होना जरूरी है ।  मीना आदिवासियो ने भी लाखों सर कटाने और जिंदा जला दिए जाने पर भी हार नहीं मानी थी और सैंकड़ो साल तक संघर्ष करते रहे लेकिन अधिकार लोकतांत्रिक भारत में अहिंसात्मक आंदोलनों से ही मिले , नक्सलवादी आदिवासियो को भी अपने अधिकार लोकतांत्रिक तरीके से पाने की सोच रखनी होगी और शिक्षा को एक अस्त्र बना कर विकास को पाने की सोच डेवलप करनी होगी । सरकार को भी इस बात को महशुश कर लेना चाहिए की जिन आदिवासीयों हजारों साल से मुगल बादशाह और अंग्रेज न हरा सके उन्हें बंदूक के बल पर नहीं जीता जा सकता यूं भी आदिवासी कटना पसन्द करता है झुकना नहीं । आदिवासीयों को सिर्फ प्रेम से जीता जा सकता है न की बंदूक से । नक्सलवाद की समस्या का समाधान न तो नक्सलियों की बंदूक से सम्भव है और न ही सरकार की बंदूक से । 
(जरायम पेशा कानून के खिलाप बुलंद आवाज परम आदरणीय लक्ष्मीनारायण झरवाल जी के देहावसान पर विशेष )
### डी एस देवराज ###

आरक्षण से जुड़ी कुछ भ्रांति

प्रथम भ्रांति - आरक्षण शब्द पर रही है क्योकि जो वास्तविकता में प्रतिनिधित्व व्यवसतः। है ।

दूसरी भ्रांति - आमजन में आरक्षण व्यवस्था के 10 वर्षीय होने की रही है जबकि वास्तविकता में नौकरी, शिक्षा में आरक्षण/ प्रतिनिधित्व मूलाधिकार के रूप में शामिल है जिसकी कोई समय सीमा नहीं है । 10 वर्षीय आरक्षण राजनीतिक आरक्षण है जिसे परिसीमन आयोग के माध्यम से  लोकसभा एवं विधानसभा की सीटों के रूप में परिभाषित किया जाता है जो 2020 में पुनः प्रस्तावित है ।

तीसरी भ्रांति - ये है की पंडित नेहरू की बजह से आरक्षण/प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गयी ।  आरक्षण पंडित नेहरू की देन नहीं बल्कि पूना पेक्ट के समय गांधी और अम्बेडकर के समझौते का परिणाम है जिसमें अम्बेडकर ने दो वोट का अधिकार छोड़ कर आरक्षण व्यवस्था को स्वीकार किया । सवर्ण हितों की दृष्टकोण से ये सवर्ण हित का निर्णय था जबकि आरक्षित वर्ग की दृष्टकोण से ये नुकसानदायक सौदा था ।

चौथी भ्रांति - आरक्षण को ले कर है की संविधान में आरक्षण की व्यवस्था अम्बेडकर की देन है जबकि वास्तविकता में मूल संविधान में आरक्षण व्यवस्था नहीं थी जिसे प्रथम संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया । याद रहे संविधान सभा में 87% से ज्यादा सवर्ण थे जिनमें भी ब्राह्मण  84% से ज्यादा थे (घनश्याम तिवाड़ी के विधानसभा में दिए बक्तव्य के अनुसार ) । 
पांचवी भ्रांति - ST एवं SC के आरक्षण के संदर्भ में है की इन्हें सामाजिक पिछड़ेपन एवं छुआछूत के कारण आरक्षण मिला । SC के आरक्षण के साथ छुआछूत एक बड़ा कारण हो सकता है लेकिन ST के आरक्षण में नहीं क्योकि ST में प्रीमेटिव ट्राइब्स को शामिल किया गया ।  सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार ये भारत देश मूलतः आदिवासियोँ का है जिनकी उपस्थिति में प्रत्येक व्यक्ति विदेशी है । जिन आदिवासियोँ का इस देश के 100% भूभाग का 90% लोग उपभोग कर रहे है उन्हें 7.5% या 12% आरक्षण दिया गया वो भीख नहीं अधिकार है।  आजादी की लड़ाई सबसे ज्यादा आदिवासी ने ही लड़ी है। 

छटी भ्रांति -  आरक्षण के कारण सवर्णो में बेरोजगारी बड़ी है जबकि वास्तविकता में बेरोजगारी बढ़ने का कारण आरक्षण नहीं बल्कि सरकार द्वारा किया जा रहा निजीकरण है। 1995 से पूर्व भी आरक्षण था लेकिन बेरोजागरी इतनी नहीं थी लेकिन मनमोहन सिंह वित्तमंत्री काल एवं नृसिंम्हा के प्रधानमंत्री काल में सरकारी क्षेत्र को खत्म करने एवं निजी क्षेत्र को बढ़ाने की शुरुआत की गई जिससे सरकारी क्षेत्र के रोजगार अवसर समाप्त होते गए । इस परम्परा को अटल विहारी फिर UPA और उसके बाद मोदी सरकार ने निरन्तर जारी रखा जिसका परिणाम ये निकला की 2013 में 1.5 लाख रोजगार केंद्र सरकार की तरफ से दिए गए लेकिन 2015 में नियुक्ति देने की संख्या 16000 का आंकड़ा भी नहीं छू पायी अर्थात 90% की कटौती केंद्र सरकार की भर्तियों में । जब सरकारी नौकरी में 90% की कटौती कर दी गयी तो आम युवा को रोजगार कैसे मिलेगा ? बेरोजगारी के इस मूल कारण को चालाक लोगो द्वारा निजीकरण के स्थान आरक्षण व्यवस्था पर थोप दिया जाता है और आम युवा का ध्यान बेरोजगारी के असल कारण निजीकरण पर न जा कर आरक्षण को उत्तरदायी ठहरा दिया जाता है ।

सातवी भ्रांति - 50% सीट सामान्य वर्ग के लिए है । ये एक सबसे बड़ी भ्रांति है । जिसे सामान्य सीट कही जाती है वो वास्तविकता में केवल  सामान्य के लिए नहीं है बल्कि इन सीटों को मेरिटकोटा कहा गया है । अर्थात ये सीट आरक्षित एवं अनारक्षित सभी वर्ग के लिए होती है ।

### डी एस देवराज ###

​#  मीना समाज की महिला स्वतंत्रता सेनानी नारंगी देवी  #

 आदरणीय नारंगी देवी जी मीना समाज की एक विभूति थी परंतु इनके द्वारा एक बंगाली से अंतर जातिय  विवाह करने के कारण समाज मे इनके कार्यो की चर्चा बहुत कम की जाती थी इस कारण इनका नाम और कार्य  धूमिल हो गया । अंतर्जातिय विवाह प्रसंग को कोई किसी रूप मे स्वीकार करे मेरा उद्देश्य इनके स्वतंत्रता सेनानी होने के कारण इनसे आजादी के आंदोलन में समाज के योगदान की वृद्वि होती है इस कारण इतिहासिक  दृष्टिकोण से इनके  संबंध में जानकारी शेयर कर रहा हू ।

नारंगी देवी जी का जन्म 3 जून 1923 को जयपुर में नाटाणीयो के बाग में हुआ । इनके दादा और पिताजी ने जयगढ में पहरेदारी का कार्य किया ।इनके पिताजी गोविंद राम जी को तीन रूपया मासिक बेतन मिलता था ।प्रगतिशील विचार धारा के होने के कारण नांरगी देवी को  पढने भेजा ।कक्षा मे विशेष योग्यता से पास होने पर जलेबी चोक में जंग बहादुर ने पांच रूपये वार्षिक स्कोलर.शिप दी इस कारण पढाई में परेशानी कम हुई ।

नारंगी देवी ने मैट्रिक ,बी ए .बी.एड ,एम .एड वनस्थली विधापीठ से की । आपके गुरू अर्जुन लाल सेठी ,हंसराय ,हीरा लाल शास्त्री ,,रमाबाई देश पांडे ,गोकुल भाई भट्ट थे ।

सन 1942 में महाराजा गर्ल्स स्कूल में  अपनी सहेलियो के साथ तिरंगा झंडा फैलाया इसकी सजा कोतवाली के सामने 15 बैतो की मिली ।जरायम पेशा कानून को अन्याय पूर्ण मानती थी इस कारण अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ हो गई तथा आजादी के आंदोलन से प्रभावित हुई ।आंदोलनो के समय दीवारो पर पैम्पलेट चिपकाने का कार्य किया ।आंदोलनो मे भाग लेने के लिए लाहोर तक गयी ।

माणिक लाल वर्मा के आदिवासी कार्यक्रम को सक्रिय यौगदान हेतु आपने हाडोती अंचल में आदिवासी कन्यादाह आश्रम का 20 वर्ष तक शिक्षण संचालन किया ।

आप आजादी के बाद नगरपालिका कोटा ,जिला परिषद ,हरिजन सेवक संघ ,आदिम जाति सेवक संघ , खादी बोर्ड ,समाज कल्याण विभाग ,भारतेन्दु समिति ,विवेकानंद समिति ,प्रगतिशील किसान प्रकोष्ठ , हाडोती सेवक संघ ,वृद्व असहाय सेवक संघ ,प्रोढ शाला समिति ,सर्वोदय की सदस्य रही ।
सन 1977-1980 में किसनगंज से एम .एल .ए .का चुनाव लडा और जीती अतः 1977-1980 के दोरान विधान सभा की सदस्य रही ।
   
सन 1944 मे नारंगी देवी B.A पास कर लिया मीना जाति में उस समय अविवाहित पढे लिखे लडको का अभाव था इनके पिताजी परेशान थे झरवाल जी ने मिडिल फेल आदरणीय कालाबादल जी से रिश्ता करने का सुझाव दिया गोविंद राम ज सहमत हो गए परंतु झरवाल जी कालाबादल जी को नारंगी देवी को दिखाने घर ले गए तब नारंगी देवी ने सहमति दे दी कालाबादल जी चुपचाप बैठे रहे तब नारंगी देवी जी ने कालाबादल जी से कहा कुछ मुंह से तो बौलो संकोच किस बात का कालाबादल जी ने जवाब दो पंक्ति के कवित्त मे दिया

बीबी बी.ए पास मिया मिडिल में फेल ।
ऐसी जोरू कसम को राम मिलाए मेल ।।
इस वाक्य को सुनकर नारंगी देवी जी हक्की बक्की हो गयी और कहा मुझे क्या समझ रखा है।

डा .प्रहलाद सिंह मीना ।

विष्णु और नारायण एक नहीं है ।

ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से पूर्व विष्णु और नारायण अलग अलग देव थे । विष्णु का सम्बन्ध आर्य वैदिक सभ्यता से था तो नारायण का सम्बन्ध अनार्य जनजातीय सभ्यता से रहा । नारायण को भगवत और उसके उपासक को भागवत कह गया ।  नारायण जनजातीय सरदार अर्थात आदिवासी कबीले के सरदार का दिव्य रूप माना गया । नारायण का सम्बन्ध जल के देवता या जल में निवास करने बाले आदिवासी सरदार का रूप माना गया ।

( अस्थियों को जल में प्रवाहित करना अवैदिक परम्परा मानी गयी है । किसी समय सभी प्रवाहित होने बाले जल स्रोतों को गंगा ही कहा जाता था । जल में खड़े हो कर पित्र तर्पण करना भी अवैदिक परम्परा रही है । बहुत सी ऐसी परम्परा और मान्यता है जो अवैदिक सँस्कृति से आर्य सँस्कृति ने ग्रहण करी है । जल की पवित्रता, गंगा, योग, ध्यान, समाधि, प्रकृति पूजा, पीपल पूजा, स्वस्तिक ये सभी अवैदिक सभ्यता से आर्य सभ्यता ने ग्रहण किया।  आर्यों ने सिंधु आगमन के बाद सिन्धुवासियों की इन परम्परा को तो ग्रहण किया ही साथ ही यहां के देवी देवताओं को भी आत्मसत किया । गणेश, शिव, काली, नारायण, लिंग पूजा, प्रकृति पूजा सहित बहुत सी चीजें है जिन्हें आर्यों ने ग्रहण किया । सिंधु सभ्यता नगरीय सभ्यता थी जबकि आर्य सभ्यता ग्राम सभ्यता जिससे ये भी अनुमान लगता है की नगर नियोजन की सभ्यता भी अनार्यो से ही आर्यों में आयी । सिंधु सभ्यता गणतन्त्रीय सभ्यता थी जिसका परिस्कृत रूप हम आधुनिक समय में देखते है जबकि आर्य सँस्कृति राजतंत्रीय थी । निसंदेह अनार्य सँस्कृति आर्य संस्कृति से बेहतर रही होगी । )

  ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में जनजातीय सरदार के दिव्य रूप नारायण को विष्णु से एकाकार कर दिया गया । सम्भवतः मीना जनजाति में मीनेष की विष्णु से उतप्ती का मूल कारण भी यही एकीकरण बनता है । चूंकि मीना जनजाति आर्यों और विष्णु से भी पूर्व की है अतः मीना जनजाति जिसका गनचिन्ह मछली जल से सम्बन्ध रखती है एवं नारायण जिसका सम्बन्ध भी जल से है साथ ही नारायण अवैदिक देवता है  अर्थात जनजातीय सरदार का दिव्य रूप जो आर्य विष्णु से पृथक अस्तित्व रखता है का सम्बन्ध मीनेष के रूप में प्रकट होता है।  नारायण और मीन गनचिन्ह का एकीकरण ही सम्भवतः मीनेष के अर्ध मछली अर्ध मानव के रूप में प्रकट किया गया । मीनेष के सिर पर सींग उसके आदिवासी कबीले के मुखिया का घोतक है ।  सम्भवतः दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में इसका सम्बन्ध  नारायण और विष्णु के एकीकरण से आर्य विष्णु से जोड़ा गया जिसकी परिणीति भागवत सम्प्रदाय के रूप में हुई जिसने अनार्य और आर्य दोनों सँस्कृति को प्रभावित किया  । इन दोनों रूपो के एकीकरण के पश्चात अनार्य कृष्ण को भी विष्णु से जोड़ दिया गया और अवतारवाद की संकल्पना को पुष्ट किया गया जिसके लिए महाभारत का पुनः लेखन किया गया । जिसमें अनार्य कृष्ण की हत्या इंद्र द्वारा किये जाने के उल्लेख को हटा कर उसका आरोप एक निषाद पर डाल दिया गया । सम्भवतः लोक मान्यता में अनार्य कृष्ण की छवि मान्यता इतनी दृढ़ हो चुकी थी जिसे मिटाया नहीं जा सके तो उसका भी नारायण मीनेष की तरह आर्यकरण करते हुए विष्णु का अवतार घोसित कर दिया गया ।  कुल मिला कर ये सारा लेखन और मिथकों को आर्य सँस्कृति को अनार्य समुदाय में मान्यता प्रदान करने के लिए किया गया । 
( शोध जारी.......)
###ड़ी एस देवराज###

राम एक नहीं है ।

राम एक नही अनेक

1 नाथ संप्रदाय के अंतर्गत रामनाथी पंथ है इस पंथ का प्रर्वतक राम कोन था ?

2ऋग्वेद मे बलवान दानी असुर राम  का उल्लेख मिलता है इस राम को नजरअंदाज किया गया है

3 एक राम से अयोध्या के राजा दशरथ का पुत्र था इससे हम सभी परिचित है ।

भील और मीना ओ के नामो मे राम शब्द बहुत पहले से जुडा हुआ है राम नारायण ,राम प्रताप ,रामलाल  ,रामकेश ,रामजीवन  ,जैसे नाम बहुत मिलते है भीलो मे 14वी शताब्दी मे रामा भील शासक हुआ था जिसके नाम पर मालवा मे रामपुरा  बसा है ।
एक राम दशरथ घर डोलै ,एक राम घर घर में बोलै।
एक राम। का सकल पसारा ,एक राम त्रिगुण से न्यारा ।।

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इका राम दशरथ घर डोले ,निराकार घर घर में बोले ।
बिंदुराम का सकल पसारा ,निरालंब सबसे ही प्यारा

राम शब्द रम धातु से बना है जो रमण सूचक है ।ग्राम का गोचर रामा कहलाता है जिसमे गाए रमण करती है ।योगी, भक्त  ईश्वर का ध्यान करके रमण करते है इसलिए ईश्वर को ही राम कहते। है ।

रामानंद जी के राम सर्वव्यापी ,चैतन्य एवं सर्व शक्तिशाली थे । इन्होने जात पात जैसी विषाक्त विचार धारा का परित्याग कर मनुष्य मात्र को अपने झंडे के नीचे आमंत्रित किया था ।भगवत प्रेम के सभी समान अधिकारी है -ऐसा ऐलान इन्होने बुलंद आवाज में किया। 
   श्री कबीर साहब ,श्री रैदास जी ,सदन कसाई ,गणिका वेश्या ,सोना बाई ,धना जाट आदि इनके मुख्य शिष्य थे ।

राम नाम के प्रसिद्ध कई महान पुरुष हुए है दशरथ पुत्र भगवान राम को कभी भी राम सिद्व नही  कहा जाता है जागा पोथीयो मे रामसिद्व का लेखन होता है जागा पोथी के प्रारम्भ मे रामसिद्व का लेखन शायद रामनाथी पंथ के राम का स्मरण है ।
भगवान राम तो वैदिक कर्मकांड को मानते थे इस कारण रामनाथ पंथ का प्रर्वतक वे नही हो सकते ।
   ऐसा प्रतीत होता है कि दानी बलवान असुर राम ही रामनाथ पंथ का प्रर्वतक था इस विषय में और शोध की जरूरत है ।

डा .प्रहलाद सिंह मीना दोसा

अजबो मीना और भागीरथ जाट

बडवाडी अजबो मीणा नि.जसाई जिला अलवर

जसाई गांव जिला अलवर के राठ अंचल के अजरका ,सोडावास ,शाहजहांपुर के पास है ।शाहजहांपुर से लगभग 12कि.मी .दूर है ।

जसाई गांव झूतरा गोत्र के जाटो का बसाया था इस गांव मे भागीरथ जाट नामक प्रसिद्ध चोधरी हुआ ।गांव का मीना चोकीदार अजबो मीना और भागीरथ जाट में घनिष्ट मित्रता थी .

अजबो और भागीरथ के समय जाट बहरोड मे नंदराम महलावत जाटहुए ।

  ताज खां को बास में उस समय रांगड मुसलमान वास करते थे ।रांगड मुसलमान राजपूत मूल के थे जिला अलवर की मंडावर तहसील में आजादी से पूर्व रांगड मुसलमानों के कई प्रसिद्ध गांव थे उनमे से ही एक ताज खा को बास था ।

किसी विवाद में ताजखा का बास के रांगड मुसलमान जाट बहरोड के नंदराम महलावत का सिर काट ले गए ।
जाट बहरोड के महलावत गोत्र के जाट  गोती भाईयो के गांव   बावल पहुंचे तथा नंदराम महलावत का सिर ताजखा का बास के रांगडो से लाने हेतु सहायता मांगी तो रांगडो के आंतक से भयभीत होकर मना कर दिया ।

भागीरथ का भाई जगराम जाट बहरोड मे रहता था उसके माध्यम से महलावत जाटो ने भागीरथ जाट से संपर्क किया ।महलावत जानते थे कि मीनाओ का सरदार अजबो मीना भागीरथ का मित्र है।

भागीरथ ने महलावत जाटो को आश्वस्त कर दिया कि वो अपने मित्र की सहायता से ताजखा के बास  के रांगडो के कब्जे से नंदराम महलावत का सिर  लाने मे  समर्पित भावना से सहयोग करेगा
भागीरथ जाट ने  अजबा मीणा के साथ  योजना बनाई अजबा ने अपने नजदीकी मीनो को भी दल मे शामिल किया ।
रात्रि को जाट बहरोड ,जसाई के जाट और  अजबा मीणा के मीणा दल ने ताज खा का बास के रांगडो पर चढाई करी इस युद्व मे अजबा मीणा एक रांगड का सिर काट लाया और योजना अनुसार सभी  जसाई गांव आ गए दसरे दिन समझोते में रांगड के सिर के बदले महलावत जाट का सिर वापिस लिया । उस युग मे अजबो मीणा को जाटो ने बडवाडी का खिताब प्रदान किया । जसाई के झूतरा जाट और महलावत जाटो मे भाई बंधी का रिश्ता कायम हुआ ।

इस क्षेत्र मे अजबो जैसे कई मीणो ने अपने मित्रो की संकट काल में सहायता करी इसी कारण इस क्षेत्र के मीना ओ को तीस चालीस बर्ष पूर्व तक बुजुर्ग जाट बडवाडी कहते थे ।बडवाडी -बडवारी का अर्थ श्रेष्ठ मित्र होता है ।

डा.प्रहलाद सिंह मीना दोसा